६ मार्च २०२६ को संघ लोक सेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा २०२५ का अंतिम परिणाम घोषित किया। ९५८ उम्मीदवार IAS, IPS, IFS और अन्य केंद्रीय सेवाओं में नियुक्त होंगे। संख्या बड़ी लगती है — पर हाजीपुर और बिहार के लिए सवाल और बड़ा है।
सेवा है या सत्ता?
डॉ. आशुतोष सिंह पूछते हैं: क्या ये अफसर जनता की सेवा के लिए तैयार हैं, या ‘सत्ता के प्रतीक’ बनकर? सिविल सेवा का उद्देश्य संविधान की सेवा था — पर जब फाइलें चलती हैं और जनता कतार में खड़ी रहती है, तो अंतर साफ दिखता है।
क्या औपनिवेशिक मानसिकता अभी भी जीवित है?
डॉ. सिंह का विश्लेषण है कि हमारे प्रशासन में अभी भी वह मानसिकता बची है जहाँ अधिकारी को ‘साहब’ मानना अनिवार्य लगता है। चयन के बाद यदि प्रशिक्षण में सहानुभूति, जवाबदेही और क्षेत्रीय भाषा-संस्कृति की समझ नहीं आती, तो परिणाम वही रहता है — दूर, ठंडा, अप्राप्य प्रशासन।
योग्यता के साथ क्या मापा जाना चाहिए?
योग्यता से चयन जरूरी है; पर योग्यता के साथ ‘सेवा भाव’ और ‘जमीनी संवेदनशीलता’ भी मापनी होगी। हाजीपुर जैसे शहरों में लोग अस्पताल, नाली, स्कूल और पटवारी के दफ्तर में इसी अंतर को रोज महसूस करते हैं।
बिहार को किस तरह के अफसर चाहिए?
डॉ. सिंह का मानना है कि बिहार को ऐसे अफसर चाहिए जो RTI का जवाब दें, जनसुनवाई में बैठें, और ‘नहीं हो सकता’ कहने से पहले विकल्प दिखाएँ — चाहे वे UPSC से आएँ या राज्य सेवा से। सिविल सेवा तभी सम्मानित रहेगी जब ‘सेवा’ शब्द सत्ता से आगे नजर आए।